Devendra Dangi
@iamdevendradang
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लगभग लेखक.
Datia, India
Joined July 2018
माननीय प्रधानमंत्री @narendramodi जी, हम पिछले कई दिनों से एक ऑनलाइन समस्या से परेशान हैं। जिसके बारे में हमने फ्लिपकार्ट और Meesho प्लेटफॉर्म्स को भी इंफॉर्म किया ��ै लेकिन कोई भी हमारी मदद नहीं कर रहा है। मैं @Shankarjorwal, IIT कानपुर में रहते हुए मैंने हिन्दी पंक्तियाँ
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साहित्य आज तक में उर्फी जावेद आ रही हैं, ऐसा साहित्य मैंने आज तक नहीं देखा था।
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ओशो ने तो ये पंक्तियां नहीं कहीं हैं, मेरे दोस्त देवेंद्र दांगी की कविता का अंश है। हालांकि ओशो इन पंक्तियों से इंप्रेस ज़रूर होते।
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Hungama hai kyun barpa thodi si jo pee li hai” Baja kar log kitna zyda pee lete hain.
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इश्क़ - 480 ॰मैं कितना कम जानता था तुम्हें॰ जैसे कोई लंबे बालों के कोनों को छुए और छूने का एहसास न हो हर एक स्पर्श ऐसा था तुम्हारा जैसे कि एक पर चलता हो जब पंखा और परदे उड़ते हों आहिस्ता इतने ही आहिस्ता मुस्कुराती थी तुम जैसे लंबी खामोशी में एक बूँद पानी गिरने पर हो
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Preity Zinta ko achanak se sunder ho jaane par bahut bahut badhiyaaaan 😬 #prietyzinta
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शामीफाइनल जैसे शब्द पर किसी एक का क्रेडिट नहीं रह गया गाईज़ #shamifinal #shami
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She : writer ho ? He : haaan She: kitabein bahut padhi hogi He: han bahut She : Naam bataiye He : Bhupendra jogi
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क्या शानदार फिल्म है यार 12th fail. बहुत ही खूबसूरती से हर बारीकी को दिखाया गया है। आप जाइए और एक बार ये फिल्म जरूर देखिए.. और अगर आप चाहें तो मेरा ये review भी देख सकते हैं। पहली बार कैमरे के सामने बोला है तो उसके बारे में भी अपने review दे सकते हैं।
Entertaining से ज्यादा Engaging है 12th Fail फिल्म In the journey of life, it's not about where you start, but how you restart. Zero se kar #Restart! Watch #12thFail in cinemas on 27th October - inspired by a million true stories #KyaAap12thFailSeTezHain #12thFailorPass
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Jab jab aap PNR status check krein IRCTC : Batao 2 aur 2 kitne hote hain. #IndianRailways
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��ये की आशा से भरे हुए, एक पुराने मज़बूत सपने को पीठ पे लादे हुए. और फिर एक दिन इन दीवारों में हम दिखना बंद हो गये, क्योंकि हम इन दीवारों के अंदर चले गये थे. लोग कहते थे इन दीवारों के अंदर थोड़े सुखी लोग ही जा पाते हैं. शायद हम सुखी हो गये थे दोस्त या नहीं ?
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उस शहर की कुछ दीवारें आईना थीं. और हम किसी भी आईने के सामने दीवार की तरह घंटों खड़े रहते थे. कभी घंटों का मौन, कभी ख़ुद से ये जानते हुए कि हम इस शहर में क्यूँ आये हैं आख़िर हम हैं कौन? कुछ नया तलाशने की इच्छा में जब भी इन दीवारों में झांकते तो हमको हम ही दिखते थे.
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सबके चहेते @vivek_uoa को जन्मदिन पर रक्षाबंधन की बहुत शुभकामनाएँ.
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